कामिनी की कामुक गाथा (भाग 54)

अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह रेखा मेरी जाल में फंस कर क्षितिज से चुद गयी। उसकी चीख पुकार सुनकर हरिया और करीम नें हमें रंगे हाथ पकड़ लिया। हमारे नोक झोंक से हमारे बीच के अनैतिक संबंधों का पर्दाफाश क्षितिज और रेखा के सामने हो गया। आवेश में आकर मैं सब कुछ बोल बैठी, सब राज खोल बैठी। सुन कर पहले तो क्षितिज और रेखा अवाक रह गये लेकिन बाद में यह महसूस करके कि हमारे परिवार के गंदगी भरे माहौल और परिस्थितियों की मारी मैं अपने इस हाल में भी बेहद खुश हूं, उनकी भावना मेरे प्रति बदल गयी। माहौल का तनाव कुछ कम हुआ और हम सब आपस में खुल गये। अब आगे –

“तो अब?” हरिया खिल उठा, सारे गिले शिकवे दूर।

“तो अब क्या हरामियों, अब भी मैं ही बोलूं?”

“वाह, बहुत बढ़िया। हम तो चुदक्कड़ ठहरे एक नंबर के, क्षितिज को भी ले आई हो अब इस लाईन में, बढ़िया, बहुत बढ़िया। लगे हाथों रेखा भी शामिल हो गयी हमारी जमात में। क्षितिज बेटे, तूू जो चाहे कर रेखा रानी केे साथ, हम देेेखते हैैं तेेेरी मां को। बूढ़े हैं तो क्या हुआ, इतनी देर में हमारा लौड़ा भी फनफनाने लग गया है।” कहते हुए फटाफट अपने कपड़े उतार कर नंगे हो गये। सत्तर इकहत्तर साल के बूढ़े, देखने में शारीरिक रूप से स्वस्थ, लेकिन चोदने में कितने समर्थ हैं इसकी परवाह किए बगैर अपने कपड़ों से मुक्त हो कर मेरी ओर भूखे भेड़ियों की तरह बढ़े। तोंद निकले हुए थे दोनों के। उनके शरीर के सारे बाल सन की तरह सफेद हो चुके थे, यहां तक कि झांट भी। घनी झांटों के बीच बेलन की तरह झूल रहे थे उनके काले काले लंड। आश्चर्य से रेखा और क्षितिज यह नजारा देख रहे थे। मेरे पास पहुंच कर हरिया नेंं मुझे दबोच लिया और दनादन चूमने चाटने लगा। करीम कहाँ पीछे रहने वाला था। उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मेरी चूचियों को बेदर्दी से मसलने लगा।

“हमारी प्यारी लंडखोर, देख हम अभी तेरा क्या हाल करते हैं।” कहते हुए दोनों मुझे सैंडविच बना कर पीसने लगे।। “आह्हह, ओह्ह रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, इतनी देर से आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मरी जा रही हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं।” वासना की ज्वाला में धधकती पिसती, उन दोनों जंगली बूढ़े भेड़ियों की नोच खसोट के आनंद में मग्न, क्षितिज और रेखा की उपस्थिति से बेखबर, डूबती जा रही थी कामुकता के सैलाब में। इन बूढ़े शेरों में अभी भी बहुत जान बाकी थी। जहाँ हरिया का टन टन करते टन्नाये हुए बेलनाकार लंड का गुलाबी सुपाड़ा मेरी ज्वालामुखी की तरह भभकती चूत के दरवाजे को फाड़ डालने को बेताब दस्तक पर दस्तक दिए रहा था वहीं करीम का विकराल गदा सरीखा लंड मेरी गांड़ के रास्ते मेरे अंदर समा जाने को आतुर ठोकरे पर ठोकरें मार कर ठकठकाता हुआ बंद गुदा के द्वार को क्षत विक्षत कर प्रवेश करने पर आमादा था। मैं कसमसा रही थी, सिसक रही थी, समर्पण के संकेत के साथ। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, हां्हां्आं्आं्आं हां्हां्हां्आं्आं्आआआआह्ह्ह्ह, मेरे रसिया आह, ऐस्स्स्स्स्स्आआआआ ही्ई्ई्ई्ई, हां हां उफ्फ्फ्फ चोद डालो मुझे मेरे बूढ़े चोदुओ, निका्आ्आ्आ्आ्आल दो मेरी सारी गरमी बुझा लो अपनी भूख प्यास।” मैं पगला गयी थी उस वक्त उनके नंगे बूढ़े तन से पिसती हुई, उनकी कामुक हरकतों से हलकान होती हुई। उन दोनों बूढ़े हवस के पुजारियों के हत्थे चढ़ी मेरे पागलपन में तड़पते तन को विस्फारित नेत्रों से देखते और मेरे होंठों से निकलते उत्तेजक उद्गारों को मंत्रमुग्ध सुनते देख मैं आवेश में क्षितिज और रेखा पर चीख पड़ी, “इस तरह देख क्या रहे हो बेवकूफों, शुरू हो जाओ।” सहसा मानो उनकी तंद्रा भंग हुई। दोनों पुनः भिड़ गये एक दूसरे से विक्षिप्तों की तरह। इस बार पहले से कुछ अधिक ही खौफनाक ढंग से टूट पड़े थे एक दूसरे पर, शायद हम तीनों के द्वारा सृजित उत्तेजक माहौल का असर था।

“उफ्फ्फ्फ रेखा आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, गांड़, आपकी गांड़, आपकी मस्त चिकनी गांड़ दीजिए मुझे।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं”

“नहीं क्या मेरी बुरचोदी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, दीजिए।” उसकी चूचियों का मलीदा बनाता हुआ खूंखार लहजे में बोला क्षितू।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, फाड़ दोगे।”

“चुप आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, बिल्कुल चुप्प्प्प्प्प। आपकी चूत फटी क्या?”

“नहीं”

“फिर?” उसने और कोई ना नुकुर सुनने की कोई जहमत नहीं उठाई, सीधे रेखा को पलट दिया और अपने लंड पर थूक लसेड़ कल उसकी गांड़ के छेद पर टिका दिया। जबरदस्ती, उसके पैरों को फैला कर, उस पर सवार था, पूरा बलात्कारी की मुद्रा में।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, आह्ह्ह्ह्ह् नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज, रोक कामिनी रोक आह मार डालेगा ओह्ह्ह्ह्ह्ह।” कराह उठी वह जब क्षितिज दबाव देने लगा अपने लंड पर। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, फट रही्ही्ई्ई्ई्ई्ई है ओह्ह्ह्ह्ह्ह मां्आ्आं्आं्आं्आं।” दर्दनाक चीख पूरे कमरे में गूंज रही थी। न मुझे परवाह थी और न ही होश, न ही हरिया और करीम को परवाह थी, फटती है तो फटे, साली कुतिया, शुरू में रोती चिल्लाती बहुत है, हरामजादी, फिर जब मजा आना शुरू होता है तो चोद, और चोद, साली नौटंकी।

“लो घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह गया, पूरा घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह गया। अब आपकी गांड़ का दरवाजा खुल्ल्ल्ल गया। आह बड़ा टाईट है ओह आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई।”

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मार डाला, मार डाला, फाड़ डाला, चीर डाला ओ्ओ्ओह्ह्ह्।” रोने लगी। क्षितिज के मजबूत बदन के नीचे दबी, पिसती, छटपटा रही थी। क्षितिज अब तक ज्ञान हासिल कर चुका था ऐसी स्थिति से निबटने के लिए। कुछ पल स्थिर रह कर रेखा की चूचियों को मसलता रहा और उसकी गर्दन को, कंधों को चूमता रहा। धीरे धीरे रेखा का रोना कलपना शांत होता चला गया और क्षितिज समझ गया कि चिड़िया जाल में फंस चुकी है। आहिस्ते आहिस्ते लंड निकालने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” एक आह दोनों के मुख से निकली। रेखा की आह राहत की तो क्षितिज की आह आनंद की। गच्च, फिर से ठोक दिया क्षितिज ने, “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” यह आह रेखा की थी, आवाज कम, दर्द कम, आनंद का पुट था उसकी आवाज में। अब और क्या था। हौले हौले गच्च गच्च, रफ्तार बढ़ाता चला गया क्षितिज। रेखा कहां कुछ पलों पहले मर्मांतक चीखें निकाल रही थी, अब आनंदय सिसकारियां निकालने को वाध्य हो गयी। “आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स्स, उस्स्स्स्, अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, आह चोद, आह्ह् चोद बेटे उफ्फ्फ्फ मां्आ्आं्आं्आं्आं।”

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई उफ्फ्फ्फ आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, मस्त मस्त गांड़ वाली आंआंआंआंआंआटी्ई्ई्ई। उफ्फ्फ्फ स्वर्ग है स्वर्ग आपकी गांड़ में आह्ह्ह्ह्ह् मेरी गांड़ मरानी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई। इतनी टाईट आह मजा आ रहा है अह्ह्ह्ह् अह्ह्ह्ह्” मस्ती में भर कर क्षितिज चोदे जा रहा था, गचागच, फचाफच। धमाचौकड़ी मचा दिया फिर उन लोगों ने तो मेरे बिस्तर पर।

इधर इसी दौरान आव देखा न ताव, भच्चाक से हरिया ने एक करारे ठाप से अपना पूरा का पूरा लंड मेरी चूत के अंदर भोंक दिया। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” निकल गयी मेरे मुख से और जैसे ही मैं उसके धक्के से थोड़ी पीछे खिसकी, तभी घच्च से करीम का लंड मेरी गांड़ का दरवाजा चीरता हुआ पूरा समा गया अंदर। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह,” मेरी चूत और गांड़, पूर्ण रुप से बिंध कर रह गयी। उफ्फ्फ्फ, पूर्णता के उस आहसास के लिए ही मैं इतनी देर से मरी जा रही थी। दोनों बूढ़े जता देना चाह रहे थे कि मैं उन्हें कमतर समझने की गलतफहमी में न रहूं। मैं खुद भी तो यही चाह रही थी। खड़े खड़े ही उन दोनों ने इस मशीनी अंदाज में मुझे चोदना चालू किया कि ओह मां, ओह मां, गजब का दम था उनका। इस बुढ़ापे में भी ऐसी चुदाई की क्षमता और वह भी खड़े खड़े? इतनी देर से वासना की तपिश मे झुलसती न जाने मैं अपने यौनांगों को मसलते, रगड़ते क्या हाल कर बैठी थी। सारे अंग तरंगित हो उठे और मिनट भर में ही मैं आनंद के अतिरेक में पागलों की तरह थरथराने लगी और झड़ने लगी, “ओह्ह्ह्ह्ह्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” बेहद सुखद थे वे पल। झड़ कर ढीली पड़ने लगी मैं। लेकिन वाह रे बूढ़े शेर, छोड़ा नहीं मुझे, उठा लिया हवा में मुझे, भुजाओं में अभी भी बहुत दम था। उसी तरह हवा में उठा कर हवाई फायर कर रहे थे। मैं हवा में हिचकोले खाती हुई चुदी जा रही थी, चूत और गांड़ का भुर्ता बनाने में तुले थे दोनों। मेरी चूचियों को इस बुरी तरह से मसल रहे थे मानो गूथ ही डालेंगे आटे की तरह। शायद, कुछ आक्रोश की अभिव्यक्ति थी, कुछ ललकार का प्रभाव था और शायद अपने उम्र को झुठला कर अपनी चोदन क्षमता को साबित करने का प्रयास। जो भी था, बेहद सुखद था। करीब बीस मिनट तक मुझे खड़े खड़े नोचते खसोटते रहे, फिर मेरी चूत में लंड फंसाए मुझे लिए दिए हरिया कुर्सी पर बैठ गया। पीछे से मेरी गांड़ में करीम का हमला जारी था। कूटे जा रहा था, कूटे जा रहा था भकाभक। उस स्थिति में करीब पांच मिनट तक मेरी चुदाई चलती रही।

“साली रंडी की चूत, ओह लंडखोर बुर्रा््रा्रा्आआ््आआट कुतिया आह्ह्ह्ह्ह्, तेरी चूत का आज भुर्ता बनाएंगे मां की लौड़ी।” हरिया मुझे झिंझोड़ता, चोदता हुआ बोलने लगा।

“आह्ह् अब भी तेरी गांड़ में वही मजा है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह गांड़ की गुद्दी, उफ्फ्फ्फ,” करीम कहने लगा। तभी उन्होंने पैंतरा बदला और अब करीम कुर्सी पर बैठा और उसके लंड पर बैठी मैं लगातार चुदी जा रही थी। हरिया अब मेरे ऊपर था, कुत्ते की तरह कमर चलाता। उफ्फ्फ्फ भगवान, अंतहीन चुदाई का वह दौर करीब आधे घंटे तक चलता रहा। पसीने से लतपत, हम तीनों चिपचिपे हो उठे थे। तभी उनके लंड और सख्त और बड़े होने लगे, मुझे लिए दिए फर्श पर आ गये और फर्र्र फर्र फौवारा छूटने लगा उनके लंड से, आह्ह्ह्, मेरी चूत और गांड़ में बेइंतहां वीर्य का मानो बाढ़ आ गया हो। मुझे इतनी सख्ती से जकड़ रखा था उस वक्त दोनों ने मानो मेरा दम ही घुट जाएगा। करीब दो मिनट तक झड़ते रहे, ओह ऐसा तो कभी पहले नहीं चोदा था मुझे पहले। निचोड़ कर रख दिया मुझे जालिमों ने। मैं बता नहीं सकती कि क्या हाल हुआ मेरा। तीन बार झड़ी मैं इस दौरान। एक ही चुदाई में मेरा सारा कस बल निकाल दिया था। वाह, खुश हो गयी मैं। दोनों से चिपकी, कभी हरिया को चूमती, कभी करीम को, “आह, खुश कर दिया रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह आप लोगों ने। दमदार चुदाई, मजा आ गया।”

“चोदना ही था, रगड़ के चोदना था, चैलेंज कर रही थी न बुर की ढक्कन।” हरिया हांफता हुआ बोला।

“हां, ठीक बोला तुमने हरिया। साली हमें चैलेंज कर रही थी। आया मजा न?” करीम भी हांफते हुए बोल पड़ा।

“हां बाबा हां। इस बुढ़ापे में भी बहुत दम है देख लिया। भुर्ता बना दिया मेरी चूत और गांड़ का। बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आया। निचोड़ कर रख दिया तुम दोनों ने तो।” उधर बिस्तर पर कुछ और ही नजारा था। क्षितिज ने रेखा को कुतिया बना डाला था। रेखा कुत्ती की तरह चार पैरों पर झुकी कमर उछाल उछाल कर क्षितिज के लंड से गांड़ मरवाये जा रही थी। क्षितिज भी पूरा कुत्ता बना हुआ, रेखा के कंधों को पकड़ कर धकमपेल किए जा रहा था। वही रेखा जो कुछ समय पहले रो चिल्ला रही थी, मजे में आंखें बंद किए चुदाई के सुखद समुंदर में डूब उतरा रही थी। “आह, ओह, ओह रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, चोद मां के लौड़े मादरचोद, कुत्ते, आह” कहती जा रही थी चुदती जा रही थी। अब क्षितिज सीधे सामने से रेखा को ठोकने लगा। रेखा की दोनों टांगों को चढ़ा लिया अपने कंधे पर और, “हां हां हां हां, ले आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, ले मेरा लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ले मेरा आ्््आआ््आआ््हह्ह,” एक लंबा निश्वास लेता हुआ इतनी जोर से लंड ठोका और जकड़ा रेखा को कि चिचिया उठी और खुद भी “उफ्फ्फ्फ रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” कहती हुई स्खलित होने लगी। क्षितज ने तो पूरी शक्ति से भींच लिया था रेखा को। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स,” कहते हुए क्षितिज भी झड़ने लगा। क्षितिज मानो रेखा की गांड़ में ही समा जाने की पुरजोर कोशिश कर रहा था वहीं रेखा मानो क्षितिज को अपनी गांड़ में निगल जाने हेतु ऐसे चिपकी जैसे छिपकली।

दोनों पूरी तरह संतुष्ट, निढाल एक दूसरे की बांहों में समाये पड़े रह गये करीब दस मिनट तक। हम सब ने जब होश हवास दुरुस्त कर समय देखा तो उस वक्त रात का नौ बज रहा था। कहां तो मैं रेखा को शाम की चाय पीने के लिए झांसा दे कर लाई थी और कहां डिनर का समय आ पहुंचा था।

“हाय राम इतनी देर हो गयी? अब मैं चलूंगी।” रेखा हड़बड़ा कर बोली।

“चुप कर। चलूंगी। कहां चलोगी। घर ही ना। कौन तेरा इंतजार कर रहा है वहां। पड़ी रह यहीं। रात का खाना खा कर जाओगी।” मैं बोली। मैं ने ऐसा कहते हुए हरिया के लंड को पकड़ा और आंख मार दी। हरिया समझ गया, आज रात ऐश करने का मौका है रेखा के साथ।

“हां हां, खाना खाकर जाना होगा बिटिया।” हरिया मेरी चूची पर चिकोटी काटता हुआ खुशी का इजहार कर बैठा।

“हां आंटी सब ठीक कह रहे हैं। रुक जाईए ना, डिनर करके ही जाईएगा।” क्षितिज बोला और रेखा मान गयी। मान क्या गयी, अपने तन को नोचने भंभोड़ने का आमंत्रण दे बैठी इन ठरकी बूढ़ों को। उन दोनों को क्या पता था कि रात में मैं और ये चोदू बूढ़े क्या धमाल करने वाले हैं।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।